Wednesday, February 18, 2026
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उत्तराखंड में सस्ती आवास योजना पर संकट, पांच महीने से नहीं मिला कोई डेवलपर

उत्तराखंड में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 के तहत पीपीपी मोड पर प्रस्तावित अफोर्डेबल हाउसिंग परियोजनाओं को झटका लगा है। पिछले पांच महीनों से एक भी निजी डेवलपर ने रुचि नहीं दिखाई है।

डेवलपर्स सरकारी भुगतान फार्मूले को अव्यावहारिक मान रहे हैं, जिससे नकदी प्रवाह की अनिश्चितता बनी रहती है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री से विशेष प्रोत्साहन और लचीले प्रावधानों का अनुरोध किया है, ताकि राज्य में सस्ते आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूरा हो सके।

देहरादून। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 के अंतर्गत पीपीपी मोड पर प्रस्तावित अफोर्डेबल हाउसिंग परियोजनाओं को उत्तराखंड में बड़ा झटका लगा है। पिछले पांच महीनों से परियोजना के लिए प्राइवेट पार्टनर की तलाश की जा रही है, लेकिन एक भी डेवलपर ने इसमें रुचि नहीं दिखाई है।

फरवरी माह में पुनः निविदा जारी कर 31 मार्च तक निजी क्षेत्र के पार्टनर्स को आमंत्रित किया गया है, इसके बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। डेवलपर्स की बेरुखी से राज्य में सस्ती आवास योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है।

रियल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि सरकार द्वारा प्रस्तावित नए भुगतान फार्मूले को बिल्डर्स व्यवहारिक नहीं मान रहे हैं। उनका तर्क है कि लाभार्थी-आधारित किश्तों और सरकारी सब्सिडी पर निर्भर माडल में कैश फ्लो की अनिश्चितता बनी रहती है। इससे परियोजना का वित्तीय ढांचा प्रभावित होता है। यदि शीघ्र निजी पार्टनर की तलाश पूरी नहीं हुई तो राज्य में सस्ते आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय समयसीमा से आगे बढ़ सकता है।

अन्य राज्यों में भी समान चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार पीपीपी आधारित अफोर्डेबल हाउसिंग में निजी भागीदारी की सुस्ती केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी डेवलपर्स ने अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई।

इसके बाद कई जगहों पर शर्तों में संशोधन, अतिरिक्त एफएआर, शुल्क में छूट और सिंगल विंडो क्लीयरेंस जैसे कदम उठाकर परियोजनाओं को गति दी गई।

नीतिगत स्तर पर इस मुद्दे पर राज्य सरकार ने केंद्र से भी सहयोग मांगा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात के दौरान उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित बाजार आकार का हवाला देते हुए विशेष प्रोत्साहन और लचीले प्रविधानों का अनुरोध किया था, ताकि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा सके।

चुनौतियां: कम लाभ, ज्यादा जोखिम

अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट में प्रति यूनिट कीमत निर्धारित होती है। निर्माण लागत खासकर सीमेंट, स्टील और श्रम में वृद्धि के चलते मुनाफा सीमित रह गया है।

इसके अलावा भूमि उपयोग परिवर्तन, नक्शा स्वीकृति और अन्य विभागीय अनुमतियों की जटिल प्रक्रिया भी निजी डेवलपर्स को हतोत्साहित करती है। जोखिम और रिटर्न के असंतुलन ने पीपीपी माडल को व्यवहारिक बनाने की चुनौती बढ़ा दी है।

आवास विभाग अफोर्डेबल हाउसिंग को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक डेवलपर्स इस योजना से जुड़ें। यदि आवश्यक हुआ तो कुछ प्रावधानों में व्यवहारिक संशोधन भी किए जाएंगे, ताकि परियोजनाएं समयबद्ध रूप से धरातल पर उतर सकें।’

-डा. आर. राजेश कुमार, सचिव आवास

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